नई दिल्ली। देश में जातिगत जनगणना को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार की ओर से जनगणना में जातियों की गणना के लिए अपनाए जा रहे तरीके पर कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि जातियों के नाम दर्ज करने के लिए मानकीकृत सूची नहीं बनाई गई तो एक ही जाति के अलग-अलग नाम, उपजातियां और क्षेत्रीय पहचान अलग-अलग दर्ज हो सकती हैं। इससे ओबीसी की वास्तविक आबादी का सही आंकड़ा सामने आने में परेशानी हो सकती है।
इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त पत्र लिखकर मौजूदा जाति जनगणना प्रश्नावली पर पुनर्विचार करने और नए सिरे से प्रश्नावली तैयार करने की मांग की है। दोनों नेताओं का कहना है कि नई प्रक्रिया तैयार करने से पहले राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।
जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार को घेरा
कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जातिगत जनगणना की मौजूदा प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरीके से जातिगत जनगणना कराई जा रही है, उससे इसके वास्तविक उद्देश्य पर सवाल खड़े होते हैं।
जयराम रमेश ने मौजूदा प्रक्रिया को सरकार का व्हाइटवॉश और सेल्फ-सैबोटाज करार दिया। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना केवल आंकड़े जुटाने का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व से है। उनके मुताबिक, जब तक देश में विभिन्न जातियों और समुदायों की वास्तविक संख्या का विश्वसनीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं होगा, तब तक सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियां प्रभावी ढंग से तैयार करना मुश्किल रहेगा।
ओबीसी की वास्तविक संख्या को लेकर सवाल
कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल ओबीसी की वास्तविक आबादी को लेकर है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि जातियों की पहचान दर्ज करने के लिए स्पष्ट और व्यवस्थित व्यवस्था नहीं बनाई गई तो एक ही जाति के अलग-अलग नाम, उपजातियां या स्थानीय पहचान अलग-अलग दर्ज हो सकती हैं।
कांग्रेस का तर्क है कि इस तरह आंकड़े बिखरने की स्थिति पैदा हो सकती है और किसी समुदाय की वास्तविक संख्या का सही आकलन करना मुश्किल हो जाएगा। इसका असर आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े फैसलों पर भी पड़ सकता है।
मानकीकृत जाति सूची की मांग
कांग्रेस ने मांग की है कि जातिगत जनगणना से पहले जातियों और समुदायों की एक मानकीकृत सूची तैयार की जाए। पार्टी का कहना है कि गणनाकर्मियों के पास स्पष्ट सूची और निर्धारित पहचान कोड होने चाहिए, ताकि एक ही जाति के अलग-अलग नामों के कारण आंकड़ों में भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
कांग्रेस नेताओं ने बिहार और तेलंगाना में हुए जातिगत सर्वेक्षणों का उदाहरण देते हुए कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यवस्थित तरीके से जातियों की पहचान और गणना की व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
2011 के अनुभव का भी हवाला
कांग्रेस ने 2011 में हुए सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वेक्षण के अनुभव का भी उल्लेख किया है। उस दौरान लोगों को अपनी जाति स्वयं बताने की अनुमति थी। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अलग-अलग जाति नाम दर्ज हुए थे, जिससे आंकड़ों को व्यवस्थित करने में काफी कठिनाई सामने आई थी।
कांग्रेस का कहना है कि आगामी जातिगत जनगणना में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं बनने दी जानी चाहिए। इसके लिए पहले से जातियों की पहचान, वर्गीकरण और कोडिंग की स्पष्ट व्यवस्था तैयार करना जरूरी है।
अखिलेश यादव भी उठा चुके हैं सवाल
जातिगत जनगणना को लेकर समाजवादी पार्टी भी केंद्र सरकार पर हमलावर है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही मौजूदा प्रक्रिया पर सवाल उठा चुके हैं। उनका कहना है कि यदि केंद्र सरकार सही तरीके से जातीय जनगणना नहीं कराती है तो उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनने पर तीन महीने के भीतर जातीय जनगणना कराई जाएगी।
सपा जातिगत जनगणना को पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग की राजनीतिक हिस्सेदारी से जोड़कर देख रही है। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
तमिलनाडु से भी उठी आवाज
तमिलनाडु के करूर से सांसद एस. ज्योतिमणि ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जातिगत जनगणना के प्रारूप में बदलाव की मांग की है। उन्होंने सुझाव दिया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरह ओबीसी तथा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए भी स्पष्ट श्रेणी निर्धारित की जाए।
उन्होंने जातियों और समुदायों की पहचान के लिए अलग-अलग डिजिटल कोड निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है। उनका कहना है कि इससे नाम, वर्तनी, उच्चारण या स्थानीय पहचान में अंतर के कारण एक ही समुदाय की प्रविष्टियां अलग-अलग दर्ज होने की समस्या को कम किया जा सकता है।
आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर
जातिगत जनगणना का मुद्दा केवल आबादी की गणना तक सीमित नहीं है। इसके साथ आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हुए हैं।
विपक्षी दलों का कहना है कि ओबीसी और अन्य पिछड़े समुदायों की वास्तविक आबादी का सही आंकड़ा सामने आने के बाद सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों को अधिक प्रभावी तरीके से तैयार किया जा सकेगा।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ओबीसी मतदाता चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जातिगत जनगणना और पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी का मुद्दा और जोर पकड़ सकता है।
आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा बनने के आसार
आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में जातिगत जनगणना का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति से लेकर राज्यों की चुनावी रणनीति तक असर डाल सकता है।
राजनीतिक दल अब जनगणना के अंतिम आंकड़े आने से पहले ही इस मुद्दे को अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे में शामिल करने लगे हैं। विपक्ष इसे सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व से जोड़ रहा है, जबकि सरकार की मौजूदा प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।
कांग्रेस ने नए प्रारूप की मांग की
कांग्रेस की मांग है कि जातिगत जनगणना की प्रश्नावली और प्रक्रिया को लेकर सभी राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों से व्यापक चर्चा की जाए। पार्टी का कहना है कि जातिगत जनगणना तभी सार्थक होगी, जब उसके आंकड़े विश्वसनीय, स्पष्ट और वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए जाएं।
अब निगाह केंद्र सरकार के अगले कदम पर है। यदि सरकार प्रश्नावली और जातियों की पहचान के तरीके में बदलाव करती है तो इसे विपक्ष की बड़ी राजनीतिक मांग पर सरकार की प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जाएगा। वहीं, यदि मौजूदा प्रक्रिया जारी रहती है तो आने वाले दिनों में जातिगत जनगणना को लेकर राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है।








