जिस डॉक्टर को देश ने पद्मश्री से सम्मानित किया, उसके साथ कथित मारपीट की खबर ने झकझोर दिया
नई दिल्ली। 85 वर्षीय पद्मश्री प्रोफेसर डॉ. टी.के. लहरी के साथ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अस्पताल में कथित मारपीट की खबर ने चिकित्सा जगत के साथ-साथ आम लोगों को भी झकझोर कर रख दिया है। परिजनों की ओर से लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं। बताया गया है कि अस्पताल के ICU में डॉ. लहरी के साथ कथित रूप से मारपीट की गई। हालांकि, जिस चिकित्सक पर आरोप लगाए गए हैं, उन्होंने मारपीट के आरोप से इनकार किया है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यपरक जांच बेहद जरूरी हो जाती है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और किसी निर्दोष के साथ अन्याय न हो।

लेकिन इस पूरे प्रकरण का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि आरोप जिस व्यक्ति से जुड़े हैं, वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि 85 वर्षीय पद्मश्री प्रोफेसर डॉ. टी.के. लहरी हैं। वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा चिकित्सा शिक्षा, मरीजों की सेवा और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को समर्पित कर दिया। जिनका नाम चिकित्सा क्षेत्र में सम्मान और सेवा भावना के साथ लिया जाता है, आज उन्हीं के साथ कथित दुर्व्यवहार और मारपीट का आरोप सामने आना समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
डॉ. टी.के. लहरी ने चिकित्सा के क्षेत्र में लंबी और उल्लेखनीय सेवा की है। वे कार्डियोथोरेसिक सर्जरी के वरिष्ठ विशेषज्ञ रहे हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। चिकित्सा शिक्षा और मरीजों के उपचार के क्षेत्र में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।
सेवानिवृत्ति के बाद भी नहीं रुकी सेवा
आमतौर पर सेवानिवृत्ति के बाद व्यक्ति अपने निजी जीवन में लौट जाता है। लेकिन डॉ. टी.के. लहरी का जीवन इस मामले में भी अलग रहा। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अपना संबंध बनाए रखा और प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में सेवा जारी रखी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी सेवा भावना केवल पद और संस्थान तक सीमित नहीं रही। जरूरतमंद मरीजों की मदद और गरीबों के उपचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता लगातार बनी रही। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, उन्होंने जरूरतमंद मरीजों के इलाज में सहयोग किया और अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा गरीब मरीजों की सहायता के लिए खर्च किया।
यही कारण है कि डॉ. लहरी का जीवन केवल एक डॉक्टर की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि सेवा, त्याग और मानवीय संवेदना की मिसाल भी है।
2016 में मिला पद्मश्री सम्मान
चिकित्सा के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान और सेवाओं को देश ने भी सम्मान दिया। भारत सरकार ने वर्ष 2016 में डॉ. टी.के. लहरी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया।
पद्मश्री केवल एक सम्मान नहीं है। यह उस व्यक्ति के योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है, जिसने अपने कार्य के माध्यम से समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।
ऐसे में जब देश द्वारा सम्मानित एक 85 वर्षीय वरिष्ठ चिकित्सक के साथ अस्पताल के ICU में कथित मारपीट की बात सामने आती है, तो सवाल केवल एक घटना तक सीमित नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि हमारे अस्पतालों में वरिष्ठ नागरिकों, बुजुर्ग मरीजों और चिकित्सा क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों के साथ व्यवहार का स्तर कैसा होना चाहिए?
क्या वरिष्ठ चिकित्सकों के सम्मान की जिम्मेदारी हमारी नहीं?
डॉ. टी.के. लहरी ने अपना जीवन मरीजों की जिंदगी बचाने में लगा दिया। जिस उम्र में उन्हें सम्मान, सम्मानजनक व्यवहार और देखभाल मिलनी चाहिए, उस उम्र में उनके साथ कथित मारपीट का आरोप सामने आना बेहद गंभीर और चिंताजनक विषय है।
हम आखिर किस दौर में जी रहे हैं?
क्या अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर किसी बुजुर्ग मरीज या वरिष्ठ चिकित्सक के साथ हाथापाई की नौबत आ सकती है? क्या ICU, जहां मरीजों को सबसे अधिक संवेदनशील देखभाल की आवश्यकता होती है, वहां विवाद और कथित मारपीट जैसी स्थिति पैदा होना स्वीकार किया जा सकता है?
इन सवालों का जवाब केवल अस्पताल प्रशासन या पुलिस को नहीं देना चाहिए, बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र को भी इस घटना को गंभीरता से देखना चाहिए।
आरोप सही हैं तो कार्रवाई हो, गलत हैं तो सच्चाई सामने आए
इस मामले में भावनाओं के साथ-साथ कानून और तथ्यों का सम्मान भी जरूरी है। परिजनों ने गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं आरोपी चिकित्सक ने मारपीट के आरोपों से इनकार किया है। इसलिए बिना जांच के किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यही कारण है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच और भी जरूरी हो जाती है।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। दूसरी ओर यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो जांच के माध्यम से वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए।
किसी भी स्थिति में मामले को दबाया नहीं जाना चाहिए।
क्योंकि यह सिर्फ एक परिवार का सवाल नहीं है। यह अस्पतालों में वरिष्ठ नागरिकों और मरीजों की सुरक्षा तथा सम्मान का सवाल है। यह चिकित्सा संस्थानों में अनुशासन और मानवीय संवेदना का सवाल है। और यह उस विश्वास का सवाल है जिसके साथ आम नागरिक अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचता है।
BHU की धरोहर हैं डॉ. लहरी
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं है। यह देश की प्रतिष्ठित शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थाओं में से एक है। ऐसे संस्थान से दशकों तक जुड़े रहे डॉ. टी.के. लहरी जैसे वरिष्ठ चिकित्सक किसी भी विश्वविद्यालय की अमूल्य धरोहर होते हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों को चिकित्सा का ज्ञान दिया, मरीजों का उपचार किया और अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को संस्थान की सेवा में लगाया। ऐसे वरिष्ठ चिकित्सकों के अनुभव और जीवन मूल्यों को अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए।
उनके साथ होने वाली हर घटना को इसी व्यापक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है।
सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाने वाले कर्मयोगी
डॉ. टी.के. लहरी की कहानी हमें यह भी बताती है कि डॉक्टर होना सिर्फ एक पेशा नहीं है। चिकित्सा सेवा मानव जीवन से जुड़ी जिम्मेदारी है।
जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा दूसरों की जिंदगी बचाने में लगा दिया, जिसने सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा का रास्ता नहीं छोड़ा और जरूरतमंद मरीजों की मदद को प्राथमिकता दी, वह आज भी समाज के लिए प्रेरणा हैं।
उनका जीवन उन युवाओं के लिए संदेश है जो चिकित्सा को केवल करियर के रूप में देखते हैं। डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास, सम्मान और मानवीय संवेदना का रिश्ता ही चिकित्सा व्यवस्था की असली ताकत है।
ऐसे कर्मयोगियों का अपमान नहीं, सम्मान होना चाहिए
आज जरूरत इस बात की है कि डॉ. टी.के. लहरी से जुड़े पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो। यदि कोई गलती हुई है तो जिम्मेदारी तय हो और यदि आरोपों में सच्चाई नहीं है तो वास्तविक तथ्य सामने आएं।
लेकिन एक बात पर समाज को जरूर विचार करना होगा।
जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी दूसरों की जिंदगी बचाने में लगा दी, क्या उसके सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी नहीं है?
क्या 85 वर्ष की उम्र में एक पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ चिकित्सक को अस्पताल के भीतर भी अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?
यह सवाल सिर्फ डॉ. टी.के. लहरी का नहीं है। यह सवाल हर बुजुर्ग मरीज, हर वरिष्ठ चिकित्सक और हर उस नागरिक का है जो अस्पताल को भरोसे और सुरक्षा की जगह मानकर वहां जाता है।
डॉ. टी.के. लहरी सिर्फ BHU की धरोहर नहीं हैं। वे चिकित्सा धर्म, सेवा भावना और मानवीय संवेदना के प्रतीक हैं। उनके जीवन से समाज को सीखने की जरूरत है।
ऐसे कर्मयोगियों का सम्मान होना चाहिए, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए और उनके साथ होने वाली किसी भी घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
क्योंकि जिस हाथ ने हजारों जिंदगियां बचाने का काम किया हो, उस हाथ के साथ कथित मारपीट की खबर केवल एक घटना नहीं होती, वह पूरे समाज की संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करती है।
Discover more from United India Live
Subscribe to get the latest posts sent to your email.














