सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि फुटपाथ पर चलना केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित एक सुरक्षित मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा है कि सड़कों पर मोटर वाहनों की आवाजाही से अधिक महत्व पैदल चलने वालों के अधिकार को दिया जाना चाहिए और जहां सड़क है, वहां फुटपाथ का निर्माण और उसका रखरखाव सुनिश्चित करना सरकार और स्थानीय निकायों की लागू की जा सकने वाली जिम्मेदारी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या देश के शहरों और महानगरों में यह अधिकार वास्तव में मौजूद है?
हकीकत यह है कि अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं या फिर उन पर दुकानों, ठेलों, अवैध पार्किंग और निर्माण सामग्री का कब्जा है। कहीं फुटपाथ टूटे हुए हैं, तो कहीं उनका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। ऐसे में पैदल चलने वाले लोगों को मजबूर होकर सड़क पर उतरना पड़ता है और हर दिन दुर्घटनाओं का खतरा उठाना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल मुआवजे का मामला नहीं है, बल्कि यह सरकारों, नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के लिए एक चेतावनी भी है कि वे पैदल यात्रियों के अधिकारों को प्राथमिकता दें। अगर संविधान नागरिकों को सुरक्षित तरीके से चलने का अधिकार देता है, तो यह सुनिश्चित करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है कि फुटपाथ अतिक्रमण मुक्त हों और उनका नियमित रखरखाव किया जाए।
आज देश के अधिकांश शहरों में करोड़ों लोग पैदल चलते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा और सुविधाओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब फुटपाथ ही कब्जे में हों, तो संविधान द्वारा दिया गया यह मौलिक अधिकार कागजों तक सीमित होकर रह जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपना कर्तव्य निभा दिया है। अब बारी सरकारों, नगर निकायों और प्रशासन की है कि वे इस अधिकार को धरातल पर उतारें। क्योंकि एक सभ्य शहर की पहचान केवल चौड़ी सड़कों और तेज रफ्तार वाहनों से नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से चल सकने वाले पैदल यात्रियों से होती है।












