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बिहार चुनाव में AIMIM का उभार: मुस्लिम एकजुटता और राजनीतिक हिस्सेदारी का नया अध्याय

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बिहार विधानसभा चुनाव ने इस बार एक ऐसी तस्वीर पेश की है जिसने न केवल प्रदेश की राजनीति को प्रभावित किया है, बल्कि पूरे देश के अल्पसंख्यक समुदाय के राजनीतिक सोच में भी एक बड़ा बदलाव दर्ज किया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने पाँच सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया है कि यदि एकजुटता और सही दिशा में मतदान हो, तो राजनीतिक भागीदारी सिर्फ़ कल्पना नहीं, बल्कि एक मजबूत हक़ीक़त बन सकती है।

मुस्लिम मतदाताओं की समझदारी और रणनीतिक वोटिंग

इन पाँच सीटों पर AIMIM की जीत कोई संयोग नहीं थी; यह समुदाय की राजनीतिक समझदारी, एकता और अपने हक़ की लड़ाई को नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश का नतीजा है।
मतदाताओं ने इस बार उन पुराने सवालों पर ध्यान देने के बजाय — “कौन सी पार्टी सरकार बनाएगी?” — एक नए और अधिक महत्वपूर्ण सवाल पर अपना ध्यान केंद्रित किया:

“सरकार किसकी बनेगी यह सवाल नहीं है, असली सवाल है कि हमारी भागीदारी कितनी होगी।”
यही सोच इस चुनाव की सबसे बड़ी जीत है। जब जनता यह तय कर ले कि उन्हें सत्ता की भीड़ में सिर्फ़ दर्शक नहीं, बल्कि बराबरी का भागीदार बनना है, तभी राजनीति का असली अर्थ बदलता है।

एआईएमआईएम की जीत — विकल्प और आवाज़ दोनों AIMIM ने अपनी जीत से यह स्पष्ट किया है कि अल्पसंख्यक समाज अब सिर्फ़ ‘वोट बैंक’ की राजनीति को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। यह समुदाय अब अपनी स्वतंत्र, सशक्त और प्रभावी राजनीतिक आवाज़ चाहता है — और इन चुनावों ने उस आवाज़ की पहली गूंज पूरे देश को सुनाई है।

ओवैसी के नेतृत्व में AIMIM ने उन इलाकों में पैर जमाए जहाँ लोगों ने वर्षों से अपनी आवाज़ को अनसुना महसूस किया था। यह सिर्फ़ पाँच सीटों की जीत नहीं, बल्कि उन लाखों वोटरों की उम्मीद है जो बराबरी के अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

क्या बाकी राज्यों में भी यह मॉडल दोहराया जा सकता है? बिहार की यह जीत एक संकेत है।
एक संदेश है और शायद आने वाले समय का रोडमैप भी।

अगर अन्य राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक—में भी मुस्लिम और वंचित समुदाय इसी तरह एकजुट होकर अपने प्रतिनिधियों का चयन करें, तो राजनीतिक संतुलन और सत्ता की भागीदारी का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है।

जब वोटर यह समझ लेंगे कि ताकत सरकार बदलने में नहीं, शासन में अपनी हिस्सेदारी तय करने में है—तभी लोकतंत्र सचमुच पूरा होगा। यह आंदोलन सिर्फ़ AIMIM का नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वाभिमान का है। बिहार में AIMIM की जीत को केवल पार्टी की उपलब्धि मानना गलत होगा। यह एक समुदाय की जागृति, जागरूकता और राजनीतिक परिपक्वता का प्रतीक है। यह उन सवालों की गूंज है जो दशकों से अनुत्तरित थे —

  • हमारी बात कौन करेगा?
  • हमारे मुद्दों पर कौन खड़ा होगा?
  • हमारे वोट की कीमत सिर्फ़ सरकार बनाने तक क्यों सीमित रहे?

Bihar ने यह संदेश दिया है कि राजनीति तभी सार्थक होगी जब प्रतिनिधित्व ईमानदार और वास्तविक होगा।
बिहार चुनाव ने साबित किया है कि यदि समाज एकजुट हो जाए, मुद्दों पर वोट करे और अपने प्रतिनिधि खुद चुने, तो उसे राजनीति में उसकी योग्य जगह और सम्मान मिल सकता है।
AIMIM की यह जीत आने वाले चुनावों का ट्रेलर है—और यदि बाकी राज्यों में भी यही सोच पनपी, तो भारत की राजनीति में एक बिल्कुल नया अध्याय खुलेगा।

 

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